पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थितेपञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते।न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु:प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्॥ १२॥ पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते=पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों …
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Svetasvatara Upanishad 2.11 Hindi
नीहारधूमार्कानिलानलानांखद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम्।एतानि रूपाणि पुर:सराणिब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे॥ ११॥ ब्रह्मणि योगे=परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; …
Svetasvatara Upanishad 2.10 Hindi
समे शुचौ शर्करावह्निवालुका-विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभि:।मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडनेगुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्॥ १०॥ समे=समतल; शुचौ=सब प्रकारसे शुद्ध; शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते=कंकड़, अग्नि …
Svetasvatara Upanishad 2.9 Hindi
प्राणान् प्रपीडॺेह संयुक्तचेष्ट:क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत।दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनंविद्वान् मनो धारयेताप्रमत्त:॥ ९॥ विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त …
Svetasvatara Upanishad 2.8 Hindi
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरंहृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य।ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥ ८॥ विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुन्नतम्=सिर, गला और …
Svetasvatara Upanishad 2.7 Hindi
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्।तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत्॥ ७॥ सवित्रा=सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन=प्राप्त हुई …