युञ्जते मन उत युञ्जते धियोविप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित:।वि होत्रा दधे वयुनाविदेकइन्मही देवस्य सवितु: परिष्टुति:॥ ४॥ * * यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वाँ मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५। …
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Svetasvatara Upanishad 2.3 Hindi
युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवम्।बृहज्ज्योति: करिष्यत: सविता प्रसुवाति तान्॥ ३॥ * * ये मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ का ३ है। सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर; सुव:=स्वर्गादि …
Svetasvatara Upanishad 2.2 Hindi
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितु: सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या॥ २॥ * * ये मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ का २ है। वयम्=हमलोग; सवितु:=सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य=परमदेव …
Svetasvatara Upanishad 2.1 Hindi
सम्बन्ध—पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच …
Svetasvatara Upanishad 1.15-16 Hindi
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि-राप: स्रोत:स्वरणीषु चाग्नि:।एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौसत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति॥ …
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Svetasvatara Upanishad 1.14 Hindi
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्।ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत्॥ १४॥ स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि; च=और; प्रणवम्= प्रणवको; उत्तरारणिम्=ऊपरकी …