सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्।
तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत्॥ ७॥
सवित्रा=सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन=प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम्=सबके आदिकारण; ब्रह्म जुषेत=उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा (आराधना) करनी चाहिये; (तू) तत्र=उस परमात्मामें ही; योनिम्=आश्रय; कृणवसे=प्राप्त कर; हि=क्योंकि; (यों करनेसे) ते=तेरे; पूर्वम्=पूर्वसंचित कर्म; न अक्षिपत् =विघ्नकारक नहीं होंगे॥ ७॥
व्याख्या—हे साधक! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्त कर तुम्हें उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा (समाराधना) करनी चाहिये, उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये—उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त संचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे—बन्धनरूप नहीं होंगे॥ ७॥
सम्बन्ध—ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—