अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मन:॥ ६॥
यत्र=जिस स्थितिमें; अग्नि:=परमात्मारूप अग्निको; (प्राप्त करनेके उद्देश्यसे) अभिमथ्यते=(ॐकारके जप और ध्यानद्वारा) मन्थन किया जाता है; यत्र=जहाँ; वायु: अधिरुध्यते=प्राणवायुका भलीभाँति विधिपूर्वक निरोध किया जाता है; (तथा) यत्र=जहाँ; सोम:=आनन्दरूप सोमरस; अतिरिच्यते=अधिकतासे प्रकट होता है; तत्र=वहाँ (उस स्थितिमें); मन:=मन; संजायते=सर्वथा विशुद्ध हो जाता है॥ ६॥
व्याख्या—जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्याय (१३,१४ मन्त्र)में कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ॐकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामें मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है॥ ६॥