युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवम्।
बृहज्ज्योति: करिष्यत: सविता प्रसुवाति तान्॥ ३॥ *
* ये मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ का ३ है।
सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर; सुव:=स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम्=आकाशमें; यत:=गमन करनेवाले; (तथा) बृहत् =बड़ा भारी; ज्योति:=प्रकाश; करिष्यत:=फैलानेवाले; तान्=उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान्=देवताओंको; मनसा=हमारे मन; (और) धिया=बुद्धिसे; युक्त्वाय=संयुक्त करके; (प्रकाश दान करनेके लिये) प्रसुवाति=प्रेरणा करता है अर्थात् करे॥ ३॥
व्याख्या—वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें; ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें॥ ३॥