सम्बन्ध—पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—
युञ्जान: प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धिय:।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत॥ १॥ *
* यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र १ इसी प्रकार है।
सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा; प्रथमम्=पहले; मन:=हमारे मन; (और) धिय:=बुद्धियोंको; तत्त्वाय=तत्त्वकी प्राप्तिके लिये; युञ्जान:=अपने स्वरूपमें लगाते हुए; अग्ने:=अग्नि (आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओं)की; ज्योति:= ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को; निचाय्य=अवलोकन करके; पृथिव्या:=पार्थिव पदार्थोंसे; अधि=ऊपर उठाकर; आभरत=हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे॥ १॥
व्याख्या—सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धिकी वृत्तियोंको तत्त्वकी प्राप्तिके लिये अपने दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो॥ १॥