आत्मानॸ रथिनं विद्धि शरीरॸ रथमेव तु।बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च॥ ३॥ आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर …
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Katha Upanishad 1.3.2 Hindi
य: सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्।अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतॸ शकेमहि॥ २॥ ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; य: सेतु:=जो दु:खसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु …
Katha Upanishad 1.3.1 Hindi
सम्बन्ध—द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा …
Katha Upanishad 1.2.25 Hindi
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदन:।मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र स:॥ २५॥ यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण …
Katha Upanishad 1.2.24 Hindi
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहित:।नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥ प्रज्ञानेन=सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि=भी; एनम्=इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरत: आप्नुयात् =न …
Katha Upanishad 1.2.23 Hindi
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन।यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूॸ स्वाम्॥ २३॥ * * यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३। २। ३) में भी इसी प्रकार है। अयम् आत्मा=यह परब्रह्म …