ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदु:।यस्तं न वेद किमृचा करिष्यतिय इत् तद् विदुस्त इमे समासते॥ ८॥ * * यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सू० १६४ का उनचालीसवाँ है तथा अथर्ववेद (९। १५। १८) में …
Blog
Svetasvatara Upanishad 4.7 Hindi
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-ऽनीशया शोचति मुह्यमान:।जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश-मस्य महिमानमिति वीतशोक:॥ ७॥ समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर …
Svetasvatara Upanishad 4.6 Hindi
द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं वृक्षं परिषस्वजाते।तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ ६॥ * * यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का २० वाँ है तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का २० वाँ …
Svetasvatara Upanishad 4.5 Hindi
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णांबह्वी: प्रजा: सृजमानां सरूपा:।अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेतेजहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य:॥ ५॥ सरूपा:=अपने ही सदृश अर्थात् …
Svetasvatara Upanishad 4.4 Hindi
नील: पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष-स्तडिद्गर्भ ऋतव: समुद्रा:।अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसेयतो जातानि भुवनानि विश्वा॥ ४॥ [त्वम् एव]=तू ही; नील:=नीलवर्ण; पतङ्ग:=पतङ्ग है; हरित:=हरे रंगका; …
Svetasvatara Upanishad 4.3 Hindi
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुख:॥ ३॥ * * यह अथर्ववेद काण्ड १० सूक्त ८ का २७ वाँ मन्त्र है। त्वम्=तू; स्त्री=स्त्री …