अथ योगानुशासनम्॥१॥ सूत्रार्थ - अथ योग की व्याख्या करते हैं। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥२॥ सूत्रार्थ - चित्त को विभिन्न वृत्तियों अर्थात् आकारों में परिणत होने से रोकना ही योग …
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अथ योगानुशासनम्॥१॥ सूत्रार्थ - अथ योग की व्याख्या करते हैं। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥२॥ सूत्रार्थ - चित्त को विभिन्न वृत्तियों अर्थात् आकारों में परिणत होने से रोकना ही योग …
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योगसूत्रों को हाथ में लेने से पहले मैं एक ऐसे प्रश्न की चर्चा करने का प्रयत्न करूँगा, जिस पर योगियों के सारे धार्मिक मत प्रतिष्ठित हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि संसार के सभी श्रेष्ठ मनीषी इस बात में एकमत …
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राजयोग का यह संक्षिप्त विवरण कूर्मपुराण के एकादश अध्याय का मुक्त्त अनुवाद है : योगाग्नि मनुष्य के पापपिंजर को दग्ध कर देती है। तब सत्त्वशुद्धि होती है और साक्षात् निर्वाण की प्राप्ति होती है। योग …
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अब तक हम राजयोग के अन्तरंग साधनों को छोड़ शेष सभी अंगो के संक्षिप्त विवरण समाप्त कर चुके हैं। इन अन्तरंग साधनों का लक्ष्य एकाग्रता की प्राप्ति है। इस एकाग्रता-शक्ति को प्राप्त करना ही राजयोग का चरम …
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प्राणायाम के बाद प्रत्याहार की साधना करनी पड़ती है। प्रत्याहार क्या है? तुम सभी को ज्ञात है कि विषयानुभूति किस तरह होती है। सब से पहले, इन्द्रियों के द्वारस्वरूप ये बाहर के यन्त्र हैं। फिर हैं …
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अब हम प्राणायाम की विभिन्न क्रियाओं के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे। हमने पहले ही देखा है कि योगियों के मत में साधना का पहला अंग फेफड़े की गति को अपने अधीन करना है। हमारा उद्देश्य है - शरीर के भीतर जो …
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