हम पहले कह चुके हैं कि ‘कर्म’ शब्द ‘कार्य’ के अतिरिक्त कार्य-कारण भाव को भी सूचित करता है। कोई कार्य, कोई विचार, जो फल उत्पन्न करता है, ‘कर्म’ कहलाता है, इसलिए ‘कर्मविधान’ का अर्थ है कार्य-कारण …
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अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है – स्वामी विवेकानंद
जिस प्रकार हमारे शरीर, मन और वचन द्वारा किया हुआ प्रत्येक कार्य हमारे पास फल के रूप में फिर से वापस आ जाता है, उसी प्रकार हमारे कार्य दूसरे व्यक्तियों पर तथा उनके कार्य हमारे ऊपर अपना प्रभाव डाल सकते …
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परोपकार में हमारा ही उपकार है – स्वामी विवेकानंद
यह विचार करने के पहले कि कर्तव्य-निष्ठा हमें आध्यात्मिक उन्नति में किस प्रकार सहायता पहुँचाती है, मैं आप लोगों को संक्षेप में यह भी बता देना चाहता हूँ कि भारतवर्ष में जिसे हम कर्म कहते हैं, उसका एक …
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कर्तव्य क्या है – स्वामी विवेकानंद
कर्मयोग का तत्व समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि कर्तव्य क्या है। यदि मुझे कोई काम करना है तो पहले मुझे यह जान लेना चाहिए कि वह मेरा कर्तव्य है, और तभी मैं उसे कर सकता हूँ। विभिन्न जातियों में, …
कर्मरहस्य – स्वामी विवेकानंद
दूसरों की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके उनकी सहायता करना महान् कर्म अवश्य है, परन्तु अभाव की मात्रा जितनी अधिक रहती है तथा सहायता या उपकार जितनी अधिक दूर तक अपना असर कर सकता है, उसी मात्रा में वह …
अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सब बड़े हैं – स्वामी विवेकानंद
सांख्यमत के अनुसार प्रकृति त्रिगुणमयी है। ये तीन गुण हैं–सत्व, रज तथा तम। बाह्य जगत् में इन तीन गुणों का प्रकाश साम्यावस्था, क्रियाशीलता तथा जड़ता के रूप में दिखायी देता है। तम की व्याख्या अन्धकार …
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