दूसरों की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके उनकी सहायता करना महान् कर्म अवश्य है, परन्तु अभाव की मात्रा जितनी अधिक रहती है तथा सहायता या उपकार जितनी अधिक दूर तक अपना असर कर सकता है, उसी मात्रा में वह …
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अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सब बड़े हैं – स्वामी विवेकानंद
सांख्यमत के अनुसार प्रकृति त्रिगुणमयी है। ये तीन गुण हैं–सत्व, रज तथा तम। बाह्य जगत् में इन तीन गुणों का प्रकाश साम्यावस्था, क्रियाशीलता तथा जड़ता के रूप में दिखायी देता है। तम की व्याख्या अन्धकार …
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कर्म का चरित्र पर प्रभाव – स्वामी विवेकानंद
कर्म शब्द ‘कृ’ धातु से निकला है; ‘कृ’ धातु का अर्थ है करना। जो कुछ किया जाता है, वही कर्म है। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ ‘कर्मफल’ भी होता है। दार्शनिक दृष्टि से यदि देखा जाय, तो इसका अर्थ कभी कभी वे फल …
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कर्मयोग – स्वामी विवेकानन्द
Love Sees No Faults
Love sees no faults. A young man from a noble family of Calcutta had fallen in with undesirable companions and through their influence had taken drugs. This was very painful for his relatives, who …
Householder’s Duties and Debts
One day Yogin-ma brought her aged mother and her daughter to the Master. They were both very happy to hear his inspiring words. Through Yogin-ma’s influence her husband, Ambika Charan, also began …