यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथे:॥ ५॥ य: सदा=जो सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; तु=और; अयुक्तेन=अवशीभूत …
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Katha Upanishad 1.3.4 Hindi
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाॸ स्तेषु गोचरान्।आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:॥ ४॥ मनीषिण:=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहु:=बतलाते हैं …
Katha Upanishad 1.3.3 Hindi
आत्मानॸ रथिनं विद्धि शरीरॸ रथमेव तु।बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च॥ ३॥ आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर …
Katha Upanishad 1.3.2 Hindi
य: सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्।अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतॸ शकेमहि॥ २॥ ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; य: सेतु:=जो दु:खसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु …
Katha Upanishad 1.3.1 Hindi
सम्बन्ध—द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा …
Katha Upanishad 1.2.25 Hindi
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदन:।मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र स:॥ २५॥ यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण …