प्राणान् प्रपीडॺेह संयुक्तचेष्ट:क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत।दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनंविद्वान् मनो धारयेताप्रमत्त:॥ ९॥ विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त …
Svetasvatara Upanishad 2.8 Hindi
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरंहृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य।ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥ ८॥ विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुन्नतम्=सिर, गला और …
Svetasvatara Upanishad 2.7 Hindi
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्।तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत्॥ ७॥ सवित्रा=सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन=प्राप्त हुई …
Svetasvatara Upanishad 2.6 Hindi
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते।सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मन:॥ ६॥ यत्र=जिस स्थितिमें; अग्नि:=परमात्मारूप अग्निको; (प्राप्त करनेके उद्देश्यसे) अभिमथ्यते=(ॐकारके जप और …
Svetasvatara Upanishad 2.5 Hindi
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभि-र्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे:।शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राआ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:॥ ५॥ * * यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११का पाँचवाँ है और ऋग्वेद (१०। १३। १) में भी …
Svetasvatara Upanishad 2.4 Hindi
युञ्जते मन उत युञ्जते धियोविप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित:।वि होत्रा दधे वयुनाविदेकइन्मही देवस्य सवितु: परिष्टुति:॥ ४॥ * * यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वाँ मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५। …