न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ ८॥
तस्य=उसके; कार्यम्=(शरीररूप) कार्य; च=और; करणम्=अन्त:करण तथा इन्द्रियरूप करण; न=नहीं; विद्यते=है; अभ्यधिक:=उससे बड़ा; च=और; तत्सम:=उसके समान; च=भी; (दूसरा) न=नहीं; दृश्यते=दीखता; च=तथा; अस्य=इस परमेश्वरकी; ज्ञानबलक्रिया=ज्ञान, बल और क्रियारूप; स्वाभाविकी=स्वाभाविक; परा=दिव्य; शक्ति:=शक्ति; विविधा=नाना प्रकारकी; एव=ही; श्रूयते=सुनी जाती है॥ ८॥
व्याख्या—उन परब्रह्म परमात्माके जीवोंकी भाँति कार्य और करण— शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं; अर्थात् उनमें देह, इन्द्रिय आदिका भेद नहीं है। तीसरे अध्यायमें यह बात विस्तारपूर्वक बतायी गयी है कि वे इन्द्रियोंके बिना ही समस्त इन्द्रियोंका व्यापार करते हैं। उनसे बड़ा तो दूर रहा, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं दीखता; वास्तवमें उनसे भिन्न कोई है ही नहीं। उन परमेश्वरकी ज्ञान, बल, और क्रियारूप स्वरूपभूत दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है॥ ८॥