तमीश्वराणां परमं महेश्वरं
तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद्
विदाम देवं भुवनेशमीडॺम्॥ ७॥
तम्=उस; ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम; महेश्वरम्=महेश्वर; देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके; च=भी; परमम्=परम; दैवतम्=देवता; पतीनाम्=पतियोंके भी; परमम्=परम; पतिम्=पति; (तथा) भुवनेशम्=समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी; (एवं) ईडॺम्=स्तुति करनेयोग्य; तम्=उस; देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको; (हमलोग) परस्तात् =सबसे परे; विदाम=जानते हैं॥ ७॥
व्याख्या—वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके—लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों—रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य प्रकाशस्वरूप परम देव परमात्माको हमलोग सबसे पर जानते हैं। उनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे ही इस जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारण हैं और वे सर्वरूप होकर भी सबसे सर्वथा पृथक् हैं॥ ७॥