आदि: स संयोगनिमित्तहेतु:
परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्ट:।
तं विश्वरूपं भवभूतमीडॺं
देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम्॥ ५॥
स:=वह; आदि:=आदि कारण (परमात्मा); त्रिकालात् पर:=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एवं) अकल:=कलारहित (होनेपर); अपि=भी; संयोगनिमित्तहेतु:=प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्ट:=देखा गया है; स्वचित्तस्थम्=अपने अन्त:करणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप; (एवं) भवभूतम्=जगत्-रूपमें प्रकट; ईडॺम्=स्तुति करनेयोग्य; पूर्वम्=पुराणपुरुष; देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये)॥ ५॥
व्याख्या—वे समस्त जगत्के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही हैं। वे (प्रश्नोपनिषद्में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे परमेश्वर ही एकमात्र स्तुति करनेयोग्य हैं। उन्हें ढूँढ़नेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ़ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्-रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये॥ ५॥
सम्बन्ध—अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है—