यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तॸ ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥ १८॥
य:=जो परमेश्वर; वै=निश्चय ही; पूर्वम्=सबसे पहले; ब्रह्माणम्=ब्रह्माको; विदधाति=उत्पन्न करता है; च=और; य:=जो; वै=निश्चय ही; तस्मै=उस ब्रह्माको; वेदान्=समस्त वेदोंका ज्ञान; प्रहिणोति=प्रदान करता है; तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम्=उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले; ह देवम्=प्रसिद्ध देव परमेश्वरको; अहम्=मैं; मुमुक्षु:=मोक्षकी इच्छावाला साधक; शरणम्=आश्रयरूपमें; प्रपद्ये=ग्रहण करता हूँ॥ १८॥
व्याख्या—उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एवं सुगम उपाय सर्वतोभावसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी शरणमें चले जाना है। अत: साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये। जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभिकमलमेंसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें नि:संदेह समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमें तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता १०। १०), उन पूर्व-मन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मैं मोक्षकी अभिलाषासे युक्त होकर शरण ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें॥ १८॥