स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनि-
र्ज्ञ: कालकालो गुणी सर्वविद् य:।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेश:
सॸसारमोक्षस्थितिबन्धहेतु:॥ १६॥
स:=वह; ज्ञ:=ज्ञानस्वरूप परमात्मा; विश्वकृत्=सर्वस्रष्टा; विश्ववित्=सर्वज्ञ; आत्मयोनि:=स्वयं ही अपने प्राकटॺका हेतु; कालकाल:=कालका भी महाकाल; गुणी=सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न; (और) सर्ववित्=सबको जाननेवाला है; य:=जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपति:=प्रकृति और जीवात्माका स्वामी; गुणेश:=समस्त गुणोंका शासक; (तथा) संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतु:=जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है॥ १६॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं। उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्माका उपसेचन—खाद्य है (१। २। २४)। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सौहार्द्र, प्रेम, दया आदि समस्त कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटनाको भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव-समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं तथा कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन-पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमें लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं॥ १६॥