नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना-
मेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:॥ १३॥
य:=जो; एक:=एक; नित्य:=नित्य; चेतन:=चेतन (परमात्मा); बहूनाम्=बहुत-से; नित्यानाम्=नित्य; चेतनानाम्=चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति=कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत् =उस; सांख्ययोगाधिगम्यम्=ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य; कारणम्=सबके कारणरूप; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशै:=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है॥ १३॥
व्याख्या—जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत-से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफलभोगोंका विधान करते हैं, जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रखी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग, दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है, इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमें नहीं पड़ता। अत: मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये॥ १३॥