एको वशी निष्क्रियाणां बहूना-
मेकं बीजं बहुधा य: करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ १२॥
य:=जो; एक:=अकेला ही; बहूनाम्=बहुत-से; निष्क्रियाणाम्=वास्तवमें अक्रिय जीवोंका; वशी=शासक है; (और) एकम्=एक; बीजम्=प्रकृतिरूप बीजको; बहुधा=अनेक रूपोंमें परिणत; करोति=कर देता है; तम्=उस; आत्मस्थम्=हृदयस्थित परमेश्वरको; ये=जो; धीरा:=धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति=निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम्=उन्हींको; शाश्वतम्=सदा रहनेवाला; सुखम्=परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम्=दूसरोंको; न=नहीं॥ १२॥
व्याख्या—जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंश होनेके कारण वास्तवमें निष्क्रिय हैं, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता— कर्मफल देनेवाले हैं, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमें बनाते हैं उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमें तन्मय हुए रहते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है; दूसरोंको अर्थात् जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते उनको वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उससे वञ्चित रह जाते हैं॥ १२॥