वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीव: स विज्ञेय: स चानन्त्याय कल्पते॥ ९॥
वालाग्रशतभागस्य=बालकी नोकके सौवें भागके; च=पुन:; शतधा=सौ भागोंमें; कल्पितस्य=कल्पना किये जानेपर; भाग:=जो एक भाग होता है; स:=वही (उसीके बराबर); जीव:=जीवका स्वरूप; विज्ञेय:=समझना चाहिये; च=और; स:=वह; आनन्त्याय=असीम भाववाला होनेमें; कल्पते=समर्थ है॥ ९॥
व्याख्या—पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है; उसे समझनेमें भ्रम हो सकता है, अत: उसे भलीभाँति समझानेके लिये पुन: इस प्रकार कहते हैं। मान लीजिये, एक बालकी नोकके हम सौ टुकड़े कर लें; फिर उनमेंसे एक टुकड़ेके पुन: सौ टुकड़े कर लें। उनमेंसे एक टुकड़ा जितना सूक्ष्म हो सकता है, अर्थात् बालकी नोकके दस हजार भाग करनेपर उनमेंसे एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उसके समान जीवात्माका स्वरूप समझना चाहिये। यह कहना भी केवल उसकी सूक्ष्मताका लक्ष्य करानेके लिये ही है। वास्तवमें चेतन और सूक्ष्म वस्तुका स्वरूप जड और स्थूल वस्तुकी उपमासे नहीं समझाया जा सकता; क्योंकि बालकी नोकके दस हजार भागोंमेंसे एक भाग भी आकाशमें जितने देशको रोकता है, उतना भी जीवात्मा नहीं रोकता। चेतन और सूक्ष्म वस्तुका जड और स्थूल देशके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; वह सूक्ष्म होनेपर भी स्थूल वस्तुमें सर्वत्र व्याप्त रह सकता है। इसी भावको समझानेके लिये अन्तमें कहा गया है कि वह इतना सूक्ष्म होनेपर भी अनन्त भावसे युक्त होनेमें अर्थात् असीम होनेमें समर्थ है। भाव यह कि वह जड जगत्में सर्वत्र व्याप्त है। केवल बुद्धिके गुण संकल्पसे और अपने गुणरूप अहंकारसे युक्त होनेके कारण ही एकदेशीय बन रहा है॥ ९॥