सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्
प्रकाशयन् भ्राजते यद्वनड्वान्।
एवं स देवो भगवान् वरेण्यो
योनिस्वभावानधितिष्ठत्येक:॥ ४॥
यत् उ=जिस प्रकार; अनड्वान्=सूर्य; (अकेला ही) सर्वा:=समस्त; दिश:=दिशाओंको; ऊर्ध्वम् अध:=ऊपर-नीचे; च=और; तिर्यक्=इधर-उधर—सब ओरसे; प्रकाशयन्=प्रकाशित करता हुआ; भ्राजते=देदीप्यमान होता है; एवम्=उसी प्रकार; स:=वह; भगवान्=भगवान्; वरेण्य: देव:=स्वामी बननेके योग्य (सर्वश्रेष्ठ) परमदेव परमेश्वर; एक:=अकेला ही; योनिस्वभावान् अधितिष्ठति=समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है॥ ४॥
व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमें प्रवृत्त करते हैं॥ ४॥
सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है—