यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको
विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वा:।
ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे
ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २॥
य:=जो; एक:=अकेला ही; योनिम् योनिम्=प्रत्येक योनिपर; विश्वानि रूपाणि=समस्त रूपोंपर; च=और; सर्वा: योनी:=समस्त कारणोंपर; अधितिष्ठति=आधिपत्य रखता है; य:=जो; अग्रे=पहले; प्रसूतम्=उत्पन्न हुए; कपिलम् ऋषिम्=कपिल ऋषि (हिरण्यगर्भ) को; ज्ञानै:=सब प्रकारके ज्ञानोंसे; बिभर्ति=पुष्ट करता है; च=तथा; (जिसने) तम्=उस कपिल (ब्रह्मा) को; जायमानम्=(सबसे पहले) उत्पन्न होते; पश्येत् =देखा था (वे ही परमात्मा हैं)॥ २॥
व्याख्या—इस जगत्में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि जितनी भी योनियाँ हैं तथा प्रत्येक योनिमें जो भिन्न-भिन्न रूप—आकृतियाँ हैं, उन सबके और उनके कारणरूप पञ्च सूक्ष्म महाभूत आदि समस्त तत्त्वोंके जो एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं॥ २॥
* कुछ विद्वानोंने ‘कपिल’ शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है।