त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुख:॥ ३॥ *
* यह अथर्ववेद काण्ड १० सूक्त ८ का २७ वाँ मन्त्र है।
त्वम्=तू; स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है; त्वम्=तू ही; कुमार:=कुमार; उत वा=अथवा; कुमारी=कुमारी; असि=है; त्वम्=तू; जीर्ण:=बूढ़ा होकर; दण्डेन=लाठीके सहारे; वञ्चसि=चलता है; [उ]=तथा; त्वम्=तू ही; जात:=विराट्रूमें प्रकट होकर; विश्वतोमुख:=सब ओर मुखवाला; भवसि=हो जाता है॥ ३॥
व्याख्या—हे सर्वेश्वर! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही बुड्ढोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन्! आप ही विराट्रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं॥ ३॥