तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा:।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत् प्रजापति:॥ २॥ *
* यह मन्त्र यजुर्वेद ३२। १ में भी आया है।
तत् एव=वही; अग्नि:=अग्नि है; तत् =वह; आदित्य:=सूर्य है; तत् =वह; वायु:=वायु है; उ=तथा; तत् =वही; चन्द्रमा:=चन्द्रमा है; तत् =वह; शुक्रम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है; तत् =वह; आप:=जल है; तत् =वह; प्रजापति:=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही; ब्रह्म=ब्रह्मा है॥ २॥
व्याख्या—वे परब्रह्म ही अग्नि, जल, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि प्रजापति और ब्रह्मा हैं। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अत: ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये॥ २॥