एष देवो विश्वकर्मा महात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्ट:।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो
य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ १७॥
एष:=यह; विश्वकर्मा=जगत्कर्ता; महात्मा=महात्मा; देव:=परमदेव परमेश्वर; सदा=सर्वदा; जनानाम्=सब मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्ट:=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा=हृदयसे; मनीषा=बुद्धिसे; (और) मनसा=मनसे; अभिक्लृप्त:=ध्यानमें लाया हुआ; [आविर्भवति=] प्रत्यक्ष होता है; ये=जो साधक; एतत् =इस रहस्यको; विदु:=जान लेते हैं; ते=वे; अमृता:=अमृतस्वरूप; भवन्ति=हो जाते हैं॥ १७॥
व्याख्या—ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चययुक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतस्वरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं॥ १७॥