घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं
ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:॥ १६॥
शिवम्=कल्याणस्वरूप; एकम् देवम्=एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम्=मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव=सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; गूढम्=छिपा हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशै:=समस्त बन्धनोंसे, मुच्यते=छूट जाता है॥ १६॥
व्याख्या—जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त करनेवाला जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है॥ १६॥