यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिता:। य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ १३॥
य:=जो; देवानाम्=समस्त देवोंका; अधिप:=अधिपति है; यस्मिन्=जिसमें; लोका:=समस्त लोक; अधिश्रिता:=सब प्रकारसे आश्रित हैं; य:=जो; अस्य=इस; द्विपद:=दो पैरवाले; (और) चतुष्पद:=चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका; ईशे=शासन करता है; (उस) कस्मै देवाय=आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा=हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके; विधेम=पूजा करें॥ १३॥
व्याख्या—जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात् सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक हवि:स्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायँ। यही उनकी प्राप्तिका सहज उपाय है॥ १३॥