तत: परं ब्रह्मपरं बृहन्तं
यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितार-
मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति॥ ७॥
तत:=पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत् के; परम्=परे; (और) ब्रह्मपरम्= हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; यथानिकायम्=उनके शरीरोंके अनुरूप होकर; गूढम्=छिपे हुए; (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए; तम्=उस; बृहन्तम्=महान्, सर्वत्र व्यापक; एकम्=एकमात्र देव; ईशम्=परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; अमृता: भवन्ति=(ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं॥ ७॥
व्याख्या—जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए हैं तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं, उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता॥ ७॥
सम्बन्ध—अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं—