या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥ ५॥ *
* यह यजुर्वेद अध्याय १६का दूसरा मन्त्र है।
रुद्र=हे रुद्रदेव!; ते=तेरी; या=जो; अघोरा=भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी=पुण्यसे प्रकाशित होनेवाली; (तथा) शिवा=कल्याणमयी; तनू:=मूर्ति है; गिरिशन्त=हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव!; तया=उस; शन्तमया तनुवा=परम शान्त मूर्तिसे; (तू कृपा करके) न: अभिचाकशीहि=हमलोगोंको देख॥ ५॥
व्याख्या—हे रुद्रदेव! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है—जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त! अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर! उस परम शान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये। आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिके योग्य बन जायँगे॥ ५॥