अणोरणीयान् महतो महीया-
नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तो:।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातु: प्रसादान्महिमानमीशम्॥ २०॥ *
* यह मन्त्र कठ उ० १। २। २० में भी है।
अणो: अणीयान्=(वह) सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म; (तथा) महत: महीयान्= बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा; अस्य जन्तो:=इस जीवकी; गुहायाम्= हृदयरूप गुफामें; निहित:=छिपा हुआ है; धातु:=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी; प्रसादात् =कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=संकल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है; (वह) वीतशोक:=सब प्रकारके दु:खोंसे रहित (हो जाता है)॥ २०॥
व्याख्या—वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके संकल्पसे सर्वथा रहित अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दु:खोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥