नवद्वारे पुरे देही हॸसो लेलायते बहि:।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥ १८॥
सर्वस्य=सम्पूर्ण; स्थावरस्य=स्थावर; च=और; चरस्य=जंगम; लोकस्य वशी=जगत्को वशमें रखनेवाला; हंस:=वह प्रकाशमय परमेश्वर; नवद्वारे=नौ द्वारवाले; पुरे=शरीररूपी नगरमें; देही=अन्तर्यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; (तथा वही) बहि:=बाह्य जगत्में भी; लेलायते=लीला कर रहा है॥ १८॥
व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य-शरीररूप नगरमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये॥ १८॥
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है—