पुरुष एवेदॸ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥ १५॥ *
* यह यजुर्वेदका ३१।१,२, ऋग्वेदका १०।९०।१,२ तथा अथर्ववेदका १९। ६। १,४ मन्त्र है।
यत् =जो; भूतम्=अबसे पहले हो चुका है; यत् =जो; भव्यम्=भविष्यमें होनेवाला है; च=और; यत् =जो; अन्नेन=खाद्य पदार्थोंसे; अतिरोहति=इस समय बढ़ रहा है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत् ; पुरुष: एव=परम पुरुष परमात्मा ही है; उत=और; (वही) अमृतत्वस्य=अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशान:=स्वामी है॥ १५॥
व्याख्या—जो अबसे पहले हो चुका है, जो भविष्यमें होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अन्नके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही अमृतस्वरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये॥ १५॥