सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगत: शिव:॥ ११॥
स:=वह; भगवान्=भगवान्; सर्वाननशिरोग्रीव:=सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है; सर्वभूतगुहाशय:=समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करता है; (और) सर्वव्यापी=सर्वव्यापी है; तस्मात् =इसलिये; [स:]=वह; शिव:= कल्याणस्वरूप परमेश्वर; सर्वगत:=सब जगह पहुँचा हुआ है॥ ११॥
व्याख्या—उन सर्वेश्वर भगवान्के सभी जगह मुख हैं, सभी जगह सिर और सभी जगह गला हैं। भाव यह कि वे प्रत्येक स्थानपर प्रत्येक अङ्गद्वारा किया जानेवाला कार्य करनेमें समर्थ हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करते हैं और सर्वव्यापी हैं, इसलिये वे कल्याणस्वरूप परमेश्वर सभी जगह पहुँचे हुए हैं। अभिप्राय यह कि साधक उनको जिस समय, जहाँ और जिस रूपमें प्रत्यक्ष करना चाहे, उसी समय, उसी जगह और उसी रूपमें वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं॥ ११॥