ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दु:खमेवापियन्ति॥ १०॥
तत:=उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे; यत् =जो; उत्तरतरम्=अत्यन्त उत्कृष्ट है; तत् =वह परब्रह्म परमात्मा; अरूपम्=आकाररहित; (और) अनामयम्=सब प्रकारके दोषोंसे शून्य है; ये=जो; एतत् =इस परब्रह्म परमात्माको; विदु:=जानते हैं; ते=वे; अमृता:=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं; अथ=परंतु; इतरे=इस रहस्यको न जाननेवाले दूसरे लोग; (बार-बार) दु:खम्=दु:खको; एव=ही; अपियन्ति=प्राप्त होते हैं॥ १०॥
व्याख्या—उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे जो सब प्रकारसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आकाररहित और सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य हैं; जो कोई महापुरुष इन परब्रह्म परमात्माको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—सदाके लिये जन्म-मृत्युके दु:खोंसे छूट जाते हैं। परंतु जो इन्हें नहीं जानते, वे सब लोग निश्चयपूर्वक बार-बार दु:खोंको प्राप्त होते हैं। अत: मनुष्यको सदाके लिये दु:खोंसे छूटने और परमानन्दस्वरूप परमात्माको पानेके लिये उन्हें जानना चाहिये॥ १०॥