एष ह देव: प्रदिशोऽनु सर्वा:
पूर्वो ह जात: स उ गर्भे अन्त:।
स एव जात: स जनिष्यमाण:
प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुख:॥ १६॥ *
* यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ३२ का चौथा है।
ह=निश्चय ही; एष:=यह (ऊपर बताया हुआ); देव:=परमदेव परमात्मा; सर्वा:=समस्त; प्रदिश: अनु=दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत (व्याप्त) है; [स:] ह=वही प्रसिद्ध परमात्मा; पूर्व:=सबसे पहले; जात:=हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; (और) स: उ=वही; गर्भे=समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें; अन्त:=अन्तर्यामीरूपसे स्थित है; स: एव=वही; जात:=इस समय जगत्के रूपमें प्रकट है; स:=और वही; जनिष्यमाण:=भविष्यमें भी प्रकट होनेवाला है; [स:]=वह; जनान् प्रत्यङ्=सब जीवोंके भीतर; (अन्तर्यामीरूपसे) तिष्ठति=स्थित है; (और) सर्वतोमुख:=सब ओर मुखवाला है॥ १६॥
व्याख्या—निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओंमें व्याप्त हैं अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों। वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुए थे। वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे ही इस समय जगत्के रूपमें प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमें पुन: प्रकट होनेवाले हैं। ये समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं॥ १६॥