ते तमर्चयन्तस्त्वं हि न: पिता योऽस्माकमविद्याया: परं पारं तारयसीति नम: परमऋषिभ्यो नम: परमऋषिभ्य:॥ ८॥
ते=उन छहों ऋषियोंने; तम् अर्चयन्त:=पिप्पलादकी पूजा की (और कहा); त्वम्=आप; हि=ही; न:=हमारे; पिता=पिता (हैं); य:=जिन्होंने; अस्माकम्=हमलोगोंको; अविद्याया: परम् पारम्=अविद्याके दूसरे पार; तारयसि इति=पहुँचा दिया है; नम: परमऋषिभ्य:=आप परम ऋषिको नमस्कार है; नम: परमऋषिभ्य:=परम ऋषिको नमस्कार है॥ ८॥
व्याख्या—इस प्रकार आचार्य पिप्पलादसे ब्रह्मका उपदेश पाकर उन छहों ऋषियोंने पिप्पलादकी पूजा की और कहा—‘भगवन्! आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें इस संसार-समुद्रके पार पहुँचा दिया। ऐसे गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई हो ही कैसे सकता है। आप परम ऋषि हैं, ज्ञानस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥ ८॥