तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद। नात: परमस्तीति॥ ७॥
ह=(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच=उन सबसे कहा; एतत्=इस; परम् ब्रह्म=परम ब्रह्मको; अहम्=मैं; एतावत् =इतना; एव=ही; वेद=जानता हूँ; अत: परम्=इससे पर (उत्कृष्ट तत्त्व); न=नहीं; अस्ति इति=है॥ ७॥
व्याख्या—इतना उपदेश करनेके बाद महर्षि पिप्पलादने परम भाग्यवान् सुकेशा आदि छहों ऋषियोंको सम्बोधन करके कहा—‘ऋषियो! इन परब्रह्म परमेश्वरके विषयमें मैं इतना ही जानता हूँ। इनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। मैंने तुमलोगोंसे उनके विषयमें जो कुछ कहना था, सब कह दिया’॥ ७॥
सम्बन्ध—अन्तमें कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे सुकेशा आदि मुनिगण महर्षिको बार-बार प्रणाम करते हुए कहते हैं—