अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिता:।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्यु: परिव्यथा इति॥ ६॥
रथनाभौ=रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अरा: इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही); यस्मिन्=जिसमें; कला:=(ऊपर बतायी हुई सब) कलाएँ; प्रतिष्ठिता:=सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम्=उस जाननेयोग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद=जानना चाहिये; यथा=जिससे (हे मनुष्यो!); व:=तुमलोगोंको; मृत्यु:=मृत्यु; मा परिव्यथा इति=दु:ख न दे सके॥ ६॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म-मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। वेदभगवान् मनुष्योंसे कहते हैं—‘जिस प्रकार रथके पहियेमें लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभिमें प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभि है— नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओंके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनसे उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जाननेयोग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त संसारमें डालकर दु:खी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे॥ ६॥