स यथेमा नद्य: स्यन्दमाना: समुद्रायणा: समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमा: षोडश कला: पुरुषायणा: पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोक:॥ ५॥
स:=वह (प्रलयका दृष्टान्त) इस प्रकार है; यथा=जिस प्रकार; इमा:=ये; नद्य:=नदियाँ; समुद्रायणा: स्यन्दमाना:=समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती (और) बहती हुई; समुद्रम्=समुद्रको; प्राप्य=पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उसीमें) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे=उनके नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; समुद्र:इति एवम्=(फिर उनको) समुद्र इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; एवम् एव=इसी प्रकार; अस्य परिद्रष्टु:=सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी; इमा:=ये (ऊपर बतायी हुई); षोडश कला:=सोलह कलाएँ; पुरुषायणा:=जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य=(प्रलयकालमें) परम पुरुष परमात्माको पाकर; अस्तम् गच्छन्ति=(उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं; च=तथा; आसाम्=इन सबके; नामरूपे=(पृथक्-पृथक्) नाम और रूप; भिद्येते=नष्ट हो जाते हैं; पुरुष: इति एवम्=(फिर उनको) ‘पुरुष’ इस एक नामसे ही; प्रोच्यते=पुकारा जाता है; स:=वही; एष:=यह; अकल:=कलारहित (और); अमृत:=अमर परमात्मा; भवति=है; तत् =उसके विषयमें; एष:=यह (अगला); श्लोक:=श्लोक है॥ ५॥
व्याख्या—जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ (अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते। एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमें ये तदाकार हो जाती हैं। अत: उन्हींके नामसे, उन्हींके वर्णनसे इनका वर्णन होता है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामें किसी प्रकारका संकल्प नहीं रहता। अत: वे समस्त कलाओंसे रहित, अमृतस्वरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है—॥ ५॥