स ईक्षांचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति॥ ३॥
स:=उसने; ईक्षांचक्रे=विचार किया (कि); कस्मिन्=(शरीरसे) किसके; उत्क्रान्ते=निकल जानेपर; अहम् उत्क्रान्त:=मैं (भी) निकला हुआ (सा); भविष्यामि=हो जाऊँगा; वा=तथा; कस्मिन् प्रतिष्ठिते=किसके स्थित रहनेपर; प्रतिष्ठास्यामि इति=मैं स्थित रहूँगा॥ ३॥
व्याख्या—महासर्गके आदिमें जगत्की रचना करनेवाले परम पुरुष परमेश्वरने विचार किया कि ‘मैं जिस ब्रह्माण्डकी रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन-सा तत्त्व डाला जाय कि जिसके न रहनेपर मैं स्वयं भी उसमें न रह सकूँ अर्थात् मेरी सत्ता स्पष्टरूपसे व्यक्त न रहे और जिसके रहनेपर मेरी सत्ता स्पष्ट प्रतीत होती रहे’॥ ३॥