तस्मै स होवाच। इहैवान्त:शरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेता: षोडशकला: प्रभवन्तीति॥ २॥
तस्मै=उससे; स: ह=वे सुप्रसिद्ध महर्षि; उवाच=बोले; सोम्य=हे प्रिय!; इह=यहाँ; अन्त:शरीरे=इस शरीरके भीतर; एव=ही; स:=वह; पुरुष:=पुरुष है; यस्मिन्=जिसमें; एता:=ये; षोडश=सोलह; कला:=कलाएँ; प्रभवन्ति इति=प्रकट होती हैं॥ २॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें उस सोलह कलाओंवाले पुरुषका संकेतमात्र किया गया है। महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—‘प्रिय सुकेशा! जिन परमेश्वरसे सोलह कलाओंका समुदाय सम्पूर्ण जगद् रूप उनका विराट् शरीर उत्पन्न हुआ है, वे परम पुरुष हमारे इस शरीरके भीतर ही विराजमान हैं; उनको खोजनेके लिये कहीं अन्यत्र नहीं जाना है। भाव यह है कि जब मनुष्यके हृदयमें परमात्माको पानेके लिये उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है, तब वे उसे वहीं उसके हृदयमें ही मिल जाते हैं॥ २॥
सम्बन्ध—उस परब्रह्म पुरुषोत्तमका तत्त्व समझनेके लिये संक्षेपसे सृष्टिक्रमका वर्णन करते हैं—