अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते॥ ४॥
अथ यदि=परंतु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका); [अभिध्यायीत]=अच्छी प्रकार ध्यान करता है तो (उससे); मनसि=मनोमय चन्द्रलोकको; सम्पद्यते=प्राप्त होता है; स: यजुर्भि:=वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें स्थित; सोमलोकम्=चन्द्रलोकको; उन्नीयते=ऊपरकी ओर ले जाया जाता है; स: सोमलोके=वह चन्द्रलोकमें; विभूतिम्=वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभूय=अनुभव करके; पुन: आवर्तते=पुन: इस लोकमें लौट आता है॥ ४॥
व्याख्या—यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है; अर्थात् उस विराट्स्वरूप परमेश्वरके अङ्गभूत भू: (मनुष्यलोक) और भुव: (स्वर्गलोक)—इन दोनोंके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे—उसीको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है; उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमें ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमें पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुन: मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्वकर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है॥ ४॥