स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते। तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति॥ ३॥
स: यदि=वह उपासक यदि; एकमात्रम्=एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत=भलीभाँति ध्यान करे तो; स: तेन एव=वह उस उपासनासे ही; संवेदित:=अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ; तूर्णम् एव=शीघ्र ही; जगत्याम्=पृथ्वीमें; अभिसम्पद्यते=उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋच:=उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ; मनुष्यलोकम्=मनुष्य-शरीर; उपनयन्ते=प्राप्त करा देती हैं; तत्र स:=वहाँ वह उपासक; तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्न:=तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम्=महिमाका; अनुभवति=अनुभव करता है॥ ३॥
व्याख्या—ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भू:, भुव: और स्व:—इन तीनों रूपोंमेंसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्यकी ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अत: उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुन: मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य-जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर अतिशय ऐश्वर्यका उपभोग करता है, अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुन: शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है॥ ३॥