तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कार:। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
तस्मै स: ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकार:=जो ओंकार है; परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपरब्रह्म भी है; तस्मात् =इसलिये; विद्वान्=इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य; एतेन एव=इस एक ही; आयतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे); एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेंसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है॥ २॥
व्याख्या—इसके उत्तरमें महर्षि पिप्पलाद ‘ओम्’ इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम! यह जो ‘ॐ’ है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है।*
* कठोपनिषद् १। २। १६ में भी यही बात कही है, वहाँ ‘अपरम्’ विशेषण नहीं दिया है।
केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वरके विराट्स्वरूप—इस जगत्के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है॥ २॥