अथ हैनं शैब्य: सत्यकाम: पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति॥ १॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे; शैब्य: सत्यकाम:=शिबिपुत्र सत्यकामने; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्; मनुष्येषु= मनुष्योंमेंसे; स: य: ह वै=वह जो कोई भी; प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त; तत् ओंकारम्=उस ओंकारका; अभिध्यायीत=सदा भलीभाँति ध्यान करता है; स: तेन=वह उस उपासनाके बलसे; कतमम् लोकम्=किस लोकको; वाव जयति=निस्संदेह जीत लेता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन सदा ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है॥ १॥