स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते॥ ७॥
स:=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये); सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी (सायंकालमें); वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर (आकर); सम्प्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं (बसेरा लेते हैं); ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक) सब-के-सब; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७॥
व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि ‘ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब-के-सब किसमें स्थित हैं—किसके आश्रित हैं।’ उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—प्यारे गार्ग्य! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायंकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममें, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं॥ ७॥
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
पृथिवी च=पृथिवी और; पृथिवीमात्रा च=उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी; आप: च आपोमात्रा च=जल और रसतन्मात्रा भी; तेज: च तेजोमात्रा च=तेज और रूप-तन्मात्रा भी; वायु: च वायुमात्रा च=वायु और स्पर्श-तन्मात्रा भी; आकाश: च आकाशमात्रा च=आकाश और शब्द-तन्मात्रा भी; चक्षु: च द्रष्टव्यम् च=नेत्र-इन्द्रिय और देखनेमें आनेवाली वस्तु भी; श्रोत्रम् च श्रोतव्यम् च=श्रोत्र-इन्द्रिय और सुननेमें आनेवाली वस्तु भी; घ्राणम् च घ्रातव्यम् च=घ्राणेन्द्रिय और सूँघनेमें आनेवाली वस्तु भी; रस: च रसयितव्यम् च=रसना-इन्द्रिय और रसनाके विषय भी; त्वक् च स्पर्शयितव्यम् च=त्वक्-इन्द्रिय और स्पर्शमें आनेवाली वस्तु भी; वाक् च वक्तव्यम् च=वाक्-इन्द्रिय और बोलनेमें आनेवाला शब्द भी; हस्तौ च आदातव्यम् च=दोनों हाथ और पकड़नेमें आनेवाली वस्तु भी; उपस्थ: च आनन्दयितव्यम् च=उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी; पायु: च विसर्जयितव्यम् च=गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी; पादौ च गन्तव्यम् च=दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी; मन: च मन्तव्यम् च=मन और मननमें आनेवाली वस्तु भी; बुद्धि: च बोद्धव्यम् च=बुद्धि और जाननेमें आनेवाली वस्तु भी; अहङ्कार: च अहङ्कर्तव्यम् च=अहंकार और उसका विषय भी; चित्तं च चेतयितव्यम् च=चित्त और चिन्तनमें आनेवाली वस्तु भी; तेज: च विद्योतयितव्यम् च=प्रभाव और उसका विषय भी; प्राण: च विधारयितव्यम् च=प्राण और प्राणके द्वारा धारण किये जानेवाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं)॥ ८॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें यह बात कही गयी है कि स्थूल और सूक्ष्म पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्त:करण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राणवायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसका विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित होनेवाली वस्तु एवं पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इसके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं॥ ८॥