स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देव: स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति॥ ६॥
स: यदा=वह (मन) जब; तेजसा अभिभूत:=तेज (उदानवायु) से अभिभूत; भवति=हो जाता है;* अत्र एष: देव:=इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता; स्वप्नान्=स्वप्नोंको; न पश्यति=नहीं देखता; अथ=तथा; तदा=उस समय; एतस्मिन् शरीरे=इस मनुष्य-शरीरमें (जीवात्माको); एतत्=इस; सुखम्=सुषुप्तिके सुखका अनुभव; भवति=होता है॥ ६॥
* पहले तीसरे प्रश्नोत्तर (३। ९-१०) में बतला आये हैं कि उदानवायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदानवायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अत: यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ मनका उदानवायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये।
व्याख्या—गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि ‘निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—जब निद्राके समय यह मन उदानवायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदानवायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्थामें यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दु:खोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३। २१)॥ ६॥