अत्रैष देव: स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुन: पुन: प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्व: पश्यति॥ ५॥
अत्र स्वप्ने=इस स्वप्न-अवस्थामें; एष: देव:=यह देव (जीवात्मा); महिमानम्=अपनी विभूतिका; अनुभवति=अनुभव करता है; यत् दृष्टम् दृष्टम्=जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति=उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुशृणोति=बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुन:-पुन: सुनता है; देशदिगन्तरै: च=नाना देश और दिशाओंमें; प्रत्यनुभूतम्=बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको; पुन: पुन:=पुन:-पुन:; प्रत्यनुभवति=अनुभव करता है (इतना ही नहीं); दृष्टम् च अदृष्टम् च=देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च=सुने हुए और न सुने हुएको भी; अनुभूतम् च=अनुभव किये हुए और; अननुभूतम् च=अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् च=विद्यमान और अविद्यमानको भी; (इस प्रकार) सर्वम् पश्यति=सारी घटनाओंको देखता है; (तथा) सर्व: [सन्]=स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति=देखता है॥ ५॥
व्याख्या—गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता स्वप्नोंको देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं, इस स्वप्न-अवस्थामें जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ-कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परंतु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत् की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है; अत: कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है, उसे और जो नहीं है, उसे भी स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार-बार अनुभव करता रहता है और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती॥ ५॥