प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति। गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीय: प्राण:॥ ३॥
एतस्मिन् पुरे=इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्नय: एव=पाँच प्राणरूप अग्नियाँ ही; जाग्रति=जागती रहती हैं; ह एष: अपान: वै=यह प्रसिद्ध अपान ही; गार्हपत्य:=गार्हपत्य अग्नि है; व्यान:=व्यान; अन्वाहार्यपचन:=अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि(दक्षिणाग्नि) है; गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते=गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह); आहवनीय:=आहवनीय अग्नि; प्रणयनात् =प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही; प्राण:=प्राणरूप है॥ ३॥
व्याख्या—उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियाँ ही जागती रहती हैं। यह गार्ग्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपत: प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमें किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी ‘गार्हपत्य’ अग्नि है; ‘व्यान’ दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपानसे प्राण उठते हैं, इस कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको ‘अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है’ इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३। ५)॥ ३॥